Sanskrit Grammar

Avyayibhav Samas/अव्ययीभाव समास…..

जिस समास में पूर्व पद की प्रधानता हो तथा सामासिक पद अव्यय बन जाता हो , उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं। अव्ययीभाव अर्थात जो अव्यय नहीं था , उसका अव्यय हो जाना ।इस समास का सामासिक पद अर्थात समास करने के बाद बना हुआ शब्द ” क्रिया विशेषण अव्यय बन जाता है।” इसमें प्रथम पद […]

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कर्मधारय समास .…समानाधिकरण तत्पुरुष

कर्मधारय समास को समानाधिकरण तत्पुरुष भी कहते हैं। यह तत्पुरुष समास का ही प्रकार है। समानाधिकरण अर्थात दोनों पद विशेषण विशेष्य भाव में हों। कर्ता कारक के हों अर्थात दोनों पदों की विभक्ति एक ही हो तथा उनके लिंग वचन भी एक समान हों। इस समास के दो मुख्य भेद द्रष्टव्य हैं.. 1.. विशेषण -विशेष्य

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तत्पुरुष समास / Tatpurush Samas…

तत्पुरुष समास .. तत्पुरुष समास…..अर्थात एक यौगिक शब्द…. दो शब्दों का जोड़ा, जिसमें पहला शब्द दूसरे शब्द को निर्धारित करता है। इस यौगिक शब्द में एक शब्द गुण वाचक संज्ञा है,तो दूसरा वास्तविक होता है । तत्पुरुष समास .. .. परिभाषा….तत्पुरुष ,उस समास को कहते हैं, जिसमे प्रथम शब्द द्वितीय शब्द की विशेषता बताता हो।इसमें

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संस्कृत-के-स्त्री-प्रत्यय..

संस्कृत-के-स्त्री-प्रत्यय..किसे कहते हैं.. परिभाषा..पुलिङ्ग् शब्दों को स्त्री लिङ्ग में परिवर्तित करने के लिये जिन प्रत्ययों क प्रयोग किया जाता है उन्हें स्त्री प्रत्यय कहते हैं। जैसे… अज् + टाप् > आ = अजा इस उदाहरण में अज पुलिङ्ग् शब्द है, जिसमे टाप् (आ )लग कर स्त्री लिंग शब्द बन गया है। संस्कृत-के-स्त्री-प्रत्यय कौन कौन से

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संज्ञा विधायक सूत्र…संस्कृत व्याकरण.

संज्ञा विधायक सूत्र..आचार्य पाणिनि ने अष्टाध्यायी में प्रयत्न लाघव के लिये कई संज्ञा सूत्रों की रचना की है। जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं.. संहिता संज्ञा .. सूत्र ” परः संनिकर्षः संहिता “ वर्णों की अत्यन्त समीपता अर्थात…व्यवधान रहित उच्चारण को संहिता कहते हैं। माहेश्वर सूत्र के लिये इसे पढ़े जैसे…सुधी + उपास्य में ई के

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क्तवतु-प्रत्यय का अर्थ/ktvatu pratyay ka arth…

क्तवतु प्रत्यय भी एक भूत कालिक कृदन्त प्रत्यय है।यह प्रत्यय केवल कर्तृ वाच्य में प्रयोग किया जाता है। नोट…कर्तृ वाच्य में कर्ता में प्रथमा और कर्म (यदि हो तो) में द्वितीया होती है। *क्रिया के लिंग और वचन कर्ता के लिंग और वचन के अनुसार होते हैं। जैसे.. १.बालकः हसितवान्। लड़का हंसा। २.बालकौ हसित्वन्तौ। दो

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क्त प्रत्यय संस्कृत व्याकरण .

भूत काल के कृत् प्रत्ययों में संस्कृत में मुख्यतःदो प्रत्यय हैं क्त तथा क्तवतु। क्त प्रत्यय भूत कालिक कृदन्त प्रत्यय है। क्त को निष्ठा कहते हैं ,जिसका संस्कृत व्याकरण में अर्थ होता है समाप्ति।अर्थात कार्य की समाप्ति। जैसे..तेन् पठितं । उसके द्वारा पढ़ा गया। अर्थात पढ़ने का कार्य समाप्त हो गया । जब हम भूत

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शानच् प्रत्यय…

शानच् प्रत्यय वर्तमान कालिक कृदन्त प्रत्यय है। यह प्रत्यय “होता हुआ” इस अर्थ में प्रयुक्त होता है, और आत्मनेपद धातुओं के साथ इसका प्रयोग होता है। शतृ और शानच् दोनो एक ही अर्थ में प्रयोग किये जाते हैं, परन्तु दोनों में यह अन्तर है, कि शतृ प्रत्यय परस्मैपद धातुओं के साथ और शानच् प्रत्यय आत्मनै

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शतृ प्रत्यय /shatri pratyay

शतृ प्रत्यय किसे कहते हैं,यह कैसे प्रयोग किया जाता है तथा किस अर्थ में किसके साथ प्रयोग किया जाता है, इस प्रत्यय के प्रयोग के नियम,यह सब् हम इस लेख के द्वारा जानेंगे… *.” शतृ ” एक वर्तमान कालिक कृदन्त प्रत्यय है। इसका प्रयोग परस्मैपद धातुओं के साथ होता है। *.कुछ धातुएं जो उभयपदी हैं,

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तुमुन् -प्रत्यय परिचय व उदाहरण

तुमुन् प्रत्यय किसे कहते हैं तथा इसका प्रयोग कहां और कैसे करते हैं…यह सब हम इस लेख के द्वारा जानेंगे… तुमुन् एक कृत प्रत्यय है। इसका प्रयोग ” के लिए” अर्थ में होता है। अर्थात क्रिया को करने के लिए ,इस अर्थ में धातु के साथ तुमुन का प्रयोग होता है। जैसे… स: पठितुम् विद्यालयम्

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