संस्कृत व्याकरण में कृत् प्रत्ययों का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। इन प्रत्ययों के माध्यम से धातुओं से अनेक प्रकार के शब्द बनाए जाते हैं। Lyut Pratyay ल्युट् प्रत्यय भी एक प्रमुख कृत् प्रत्यय है। इसका प्रयोग मुख्यतः भाव, करण तथा अधिकरण के अर्थ में किया जाता है। ल्युट् प्रत्यय लगने पर सामान्यतः इसका ‘अन्’ आदेश हो जाता है, जिससे गमनम्, पठनम्, लेखनम्, भोजनम्, दर्शनम् आदि शब्द बनते हैं। इस लेख में हम ल्युट् प्रत्यय की परिभाषा, नियम, उदाहरण, प्रयोग तथा अभ्यास प्रश्नों का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
Lyut Pratyay ल्युट् प्रत्यय का अर्थ भाव होता है।भाव वाचक संज्ञा बनाने के लिये धातुओं कॆ साथ ‘ल्युट्’ प्रत्यय होता है। ‘ल्युट्’ का ‘अन्’ होकर धातु से जोड़ा जाता है। जैसे ‘गम्’ से ‘गमनम्’ ‘पठ’ से ‘पठनम्’ ।
यह निम्न लिखित अर्थों में भी प्रयोग किया जाता है…
करण तथा अधिकरण के अर्थ में भी ल्युट् होता है।
करण अर्थ में…
जब किसी साधन या उपकरण का बोध कराया जाता है, तब भी ल्युट् प्रत्यय का प्रयोग होता है।
जैसे-या + ल्युट् = यानम् (जिससे जाया जाय-करण अर्थ में )
अधिकरण अर्थ में
जब किसी स्थान का बोध कराया जाए, तब भी ल्युट् प्रत्यय लगाया जाता है।
स्था + ल्युट - स्थानम् (जिस पर बैठा जाय - अधिकरण अर्थ में )
ल्युट् प्रत्यय से शब्द बनाने के नियम..
(१) धातु के साथ ल्युट् प्रत्यय का अन् जुड़ता है।
(२)अन्’ जुड़ने के बाद व्यञ्जनान्त धातुओ की उपधा (अन्तिम व्यंजन से पूर्व का स्वर ) के ह्रस्व इ, उ, ऋ का गुण होता है (अर्थात् उपधा की इ को ए, उ, को ओ ऋ को अर् हो जाता है।) अर्थात…यदि धातु व्यंजनान्त हो तथा उसकी उपधा में इ, उ या ऋ हो, तो उनका गुण हो जाता है।
- इ =ए
- उ =ओ
- ऋ =अर्
जैसे –
- सिच् + ल्युट् सेचनम्, (सिच् का इ, ए में परिवर्तित हुआ )
- बुध + ल्युट् बोधनम्, (बुध् का उ,,ओ में परिवर्तित हुआ )
- कृष्+ ल्युट् कर्षणम् । (कृष् का ऋ, अर् में परिवर्तित हुआ )
(३)-धातु के अन्त के स्वर का भी गुण होता है (अर्थात् ई को ए, उ को ओ और ऋ को अर हो जाता है।) जैसे-
- नी + ल्युट् नयनम्,
- भू +ल्युट् भवनम्
- कृ +ल्युट् करणम्
Lyut Pratyay ल्युट् प्रत्ययान्त शब्दों के लिङ्ग..
इस प्रत्यय से बने शब्द सदा नपुंसक लिंग में प्रयुक्त होते हैं, अतः इनके रूप अकारान्त नपुंसक लिंग शब्द गृह, फल, पुस्तक आदि की तरह चलते हैं.
Lyut Pratyay ल्युट् प्रत्ययान्त शब्दों के रूप –
रूप…
| गृहं | गृहे | गृहाणि |
| गृहं | गृहे | गृहाणि |
| गृहेण | गृहाभ्यां | गृहैः |
| गृहाय | गृहाभ्यां | गृहेभ्यः |
| गृहात् | गृहाभ्यां | गृहेभ्यः |
| गृहस्य | गृहयोः | गृहाणां |
| गृहे | गृहयोः | गृहेषु |
प्रयोग
lyut Pratyay Ke Vakya… ल्युट् प्रत्यय से बने वाक्य
ल्युट् प्रत्ययान्त शब्दों का प्रयोग साधारण भाववाचक संज्ञाओं की तरह होता है….
जैसे-
- तवरोदनं न उचितम। -तुम्हारा रोना उचित नहीं है।
- दुग्धपान सर्वदा हितकरम् भवति। दूध का पीना सर्वदा हितकर होता है।
- प्रातः काले देव दर्शनं शुभं भवति। प्रातः काल देव का दर्शन शुभ होता है।
- मह्यम् शिक्षणं रोचते।
- बृक्षस्य कर्तनं मा कुरु।
- सीतायाः हरणम् रावणस्य विनाशकारणं अभवत्।
- खादन् समये हसनं न करणीयं।
- पञ्च वादने स्वागत गानम् भविष्यति।
- निर्जन स्थाने रोदनं वृथा।
- सहसा मेघ गर्जनम् आरभत्।
- सः पुस्तकस्य पठनम् करोति।
****कुछ धातुओं के ल्युट् प्रत्ययान्त रूप नीचे लिखे गये हैं-
| धातु + ल्युट् | शब्द | अर्थ |
| भू+ ल्युट् | भवनं | होना |
| अर्च् + ल्युट् | अर्चनं | अर्चना करना |
| श्रु+ ल्युट् | श्रवणम् | सुनना |
| गम् + ल्युट् | गमनं | जाना |
| हन् + ल्युट् | हननम् | मारना |
| कृ + ल्युट् | करणम् | करना |
| हृ. + ल्युट् | हरणम् | हरना /चुराना |
| लिख् + ल्युट् | लेखनम् | लिखना |
| भुज्. + ल्युट् | भोजनम् | भोजन करना |
| धृ + ल्युट् | धारणं | धारण करना |
| बुध् + ल्युट् | बोधनम् | बोध होना |
| तृप् + ल्युट् | तर्पणं | तृप्त होना |
| हस् + ल्युट् | हसनं | हँसना |
| मुद् + ल्युट् | मोदनं | प्रसन्न होना |
| मृष + ल्युट् | मर्षणम् | सहना |
| गण् + ल्युट् | गणनं | गिनना |
| सृज् + ल्युट् | सर्जनं | सृष्टि करना |
| पा + ल्युट् | पानं | पीना |
| हु + ल्युट् | हवनम् | हवन करना |
भवनम्
| स्तु + ल्युट् | स्तवनम् | स्तुति करना |
| दृश् + ल्युट् | दर्शनं | देखना |
| स्वप् + ल्युट् | स्वपनम् | सोना |
| नी + ल्युट् | नयनम | ल ले जाना |
| भक्ष् + ल्युट् | भक्षणम | रवाना |
| शी + ल्युट् | शयनम् | सोना |
| गै + ल्युट् | गायनम | गाना |
| सह् + ल्युट् | सहनम् | सहन करना |
| यज् + ल्युट् | यजनं | यज्ञ करना . |
| सेव् + ल्युट् | सेवनम् | सेवन करना |
| ग्रह् + ल्युट् | ग्रहणं | ग्रहण |
| दा + ल्युट् | दानं | दानदेना |
Lyut Pratyay अभ्यास कार्य…
१- निम्न धातुओं के ‘ल्युद्’ प्रत्ययान्त रूप लिखकर वाक्यों में प्रयोग करो-i
अर्च, पूज, नम्, लिन्, कथ्, स्था, दा, नी, हु, हुन् त, दूश, नन्द, त्रे, कुप्, कम्प ।
२- निम्न का प्रकृति प्रत्यय विभाग करके अपने वाक्यों में प्रयोग करो।
यजनम्, नर्तनम्, श्रवणम्, तरुणम्, लेखनम्, भजनम्, प्रहरणम्, अनुगमनम्, गायनम्,
ध्वंसनम्, धावनम्, ज्वलनम्, खादनम् ।
तव्यत प्रत्यय…परिचय तथा प्रयोग के नियम ..
अनीयर् प्रत्यय.परिचय/Aniyar Pratyaya