षड् वेदाङ्ग परिचय..

षड् वेदाङ्ग परिचय…वेदाङ्ग क्या हैं…

..वेदाङ्ग का अर्थ है ‘वेदस्य अङ्गानि’ … अर्थात वेद का अङ्ग। वेदों के वास्तविक अर्थ के ज्ञान के लिये जिन साधनों की आवश्यकता होती है, उन्हें वेदाङ्ग कहते हैं।

अङ्ग क्या हैं…. अङ्ग्यन्ते ज्ञायन्ते एभिरिति अङ्गानि….जिसके द्वारा किसी वस्तु या व्यक्ति के स्वरूप को समझने में सहायता मिलती है उसे, उस वस्तु का अङ्ग कहते हैं।

वेदाङ्गों के द्वारा वेदों के मन्त्रों का अर्थ, उनकी व्याख्या एवं यज्ञादि में उनके विनियोग का बोध होता था। प्रारम्भ में ये स्वतन्त्र  विषय न हो कर वेदाध्ययन के उपयोगी प्रकार थे। बाद में ये स्वतन्त्र विषयों के रूप में विकसित हुए। सर्व प्रथम वेदाङ्गों का उल्लेख मुण्डक उपनिषद में पाया जाता है।

षड् वेदाङ्ग परिचय..

वेदाङ्ग  संख्या में 6 हैं..जो इस प्रकार हैं..

1..शिक्षा

2..कल्प

3.. व्याकरण

4.. निरुक्त

5..छन्द

6..ज्योतिष

इन वेदाङ्ग के बारे में पाणिनीय शिक्षा में वेद के  6 अङ्गों के रूप में 6 वेदाङ्गों का वर्णन है..। इन्हें वेदों के विभिन्न अङ्ग के रूप में बताया गया है।

छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते।

ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते।।

शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य, मुखं व्याकरणम् स्मृतं।

तस्मात् साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते।।

इन 6 वेदाङ्गों का संक्षेप में वर्णन इस प्रकार है…

षड् वेदाङ्ग परिचय ..

1.. शिक्षा..

वेदाङ्गों में शिक्षा का महत्वपूर्ण स्थान है।  शिक्षा ग्रन्थों का विकास वैदिक मन्त्रों का शुद्ध उच्चारण तथा तथा उनकी रक्षा के उद्देश्य से हुआ है।

इनमें शिक्षा का अर्थ  बताया गया है..वर्णोच्चारण की शिक्षा देना। आचार्य सायण नें शिक्षा के बारे में बताया है कि.. ” स्वर वर्णादि उच्चारण प्रकारो यत्र शिक्ष्यते उपदिश्यते सा शिक्षा “। अर्थात जिसमें स्वर वर्ण आदि की शिक्षा दी जाती है , उस ग्रन्थ को शिक्षा कहते हैं।

शिक्षा को वेद पुरुष का घ्राण अर्थात नासिका बताया गया है।” शिक्षा घ्राणं तु  वेदस्य.. “

जिस प्रकार जिस प्रकार शरीर के संपूर्ण अङ्ग बिल्कुल ठीक हों, व्यक्ति का मुख भी सुन्दर हो परन्तु उस पर नासिका न हो  तो व्यक्ति चमत्कार पूर्ण स्वरूप प्राप्त नहीं कर सकता है, उसका रूप विकृत हो जाता है तथा उसकी सर्वत्र निन्दा होती है उसी प्रकार वेद शिक्षा ग्रन्थों के बिना हो जाता है।क्योंकि यदि वैदिक मन्त्रों का सही उच्चारण नहीं होगा तो वेद का स्वरूप ही विकृत हो जायेगा, जिसके कारण अभीष्ट की प्राप्ति भी नहीं होगी।

शिक्षा शास्त्र का उद्देश्य है वर्ण के  सही उच्चारण की शिक्षा देना। किस वर्ण का उच्चारण मुख के किस स्थान से किया जाता है, उसमें क्या प्रयत्न करना पड़ता है, वर्ण कितने हैं,  मुख के अन्दर कितने उच्चारण स्थान हैं कौन कौन से प्रयत्न हैं , शरीर के अन्दर जाने वाली वायु किस प्रकार  वर्ण रूप में परिवर्तित होती है, स्वरों की  कितनी संख्या है तथा उनका उच्चारण किस प्रकार किया जाता है आदि।

अर्थात यदि वैदिक मन्त्रों का उच्चारण सही ढङ्ग से नहीं होने पर अर्थ का अनर्थ हो जाता है।

शिक्षा ग्रन्थों का वैदिक संहिताओं से घनिष्ट संबन्ध है। इनमें शुद्ध उच्चारण और स्वरों के संचार के नियम बताये गये हैं। चारो वेदों की कई शाखाएं हैं तथा शिक्षा ग्रन्थ प्रत्येक शाखा से संबद्ध होने के कारण इन्हें प्रातिशाख्य कहते हैं। कुछ प्रमुख प्रतिशाख्य निम्नलिखित हैं….

1.. ऋक् प्रातिशाख्य.. यह ऋग्वेद की शाकल शाखा से संबन्धित है। यह शौनक द्वारा लिखा गाया है।

2.. शुक्ल यजुः प्रातिशाख्य.. यह कात्यायन द्वारा रचित है तथा शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा से संबन्धित है।

3..तैत्तिरीय   प्रातिशाख्य…  यह कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा का शिक्षा ग्रन्थ है।

4.. सामवेद के तीन प्रातिशाख्य हैं.. साम प्रातिशाख्य , पुष्पसूत्र,  पञ्चविध सूत्र।

5.. अथर्व प्रातिशाख्य… यह अथर्ववेद का प्रातिशाख्य है। इसे चातुरध्यायिका भी कहते हैं।

तैत्तिरीय उपनिषद में शिक्षा के 6 अङ्गों का वर्णन है… वर्ण ,स्वर ,मात्रा, बल, साम, संतान।

संक्षेप में इनाका वर्णन इस प्रकार है..

1..वर्ण.. संस्कृत वर्णमाला में 63 वर्ण हैं.. यदि अ को विवृत से अलग माने तो 64 वर्ण हैं। वेदाध्ययन के लिये सर्वप्रथम वर्णों का तथा वर्णमाला का शुद्ध ज्ञान प्राप्त करना अनिवार्य है।

2. स्वर… वैदिक. मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण के लिये स्वरों का ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है। उदात्त , अनुदात्त और स्वरित ये तीन स्वर हैं, जिनके उच्चारण के नियम हैं। स्वरों का सही उच्चारण नहीं होने  से अर्थ भेद हो जाता है ,गलत अर्थ निकलता है।

3.. मात्रा … स्वरों के उच्चारण में लगने वाले समय को मात्रा कहते हैं। ये तीन हैं.. ह्रस्व , दीर्घ , प्लुत । ह्रस्व स्वर की एक मात्रा , दीर्घ स्वर की दो मात्रा तथा प्लुत स्वर तीन मात्रा होती है।

4.. बल.. वर्णों के उच्चारण में होने वाले प्रयत्न  तथा तथा उनके उच्चारण स्थान को बल कहते हैं।

प्रयत्न दो हैं..1.. अभ्यान्तर  2.. वाह्य।

उच्चारण स्थान 8 हैं… जिह्वा ,कण्ठ,तालु  मूर्धा , दन्त, ओष्ठ नासिका  आदि। तथा कंठतालु , कंठोष्ठ, दंतोष्ठ, जिह्वामूल।

इन सभी स्थानों और प्रयत्नों से यथायोग्य रीति से वर्णोच्चारण की शिक्षा हमें पाणिनीय शिक्षा से मोलति है।

5.. साम.. अर्थात वर्णों का सम् विधि से , स्पष्ट तथा सुस्वर उच्चारण करना साम है। वर्णों का स्पष्ट उच्चारण करना चहिये , किसी वर्ण को दबा कर नहीं बोलना तथा बहुत शीघ्रता से नहीं बोलना ,  स्वर तथा अर्थ ज्ञान सहित प्रत्येक वर्ण का उच्चारण करना चाहिये.. इस प्रकार की शिक्षा इसमें दी गई है।

6.. संतान. पद पाठ में प्रयुक्त पदों में संधि नियमों का प्रयोग करना।

शिक्षा वेदाङ्ग के प्रमुख ग्रन्थ..

• ऋग्वेद.. के शिक्षा ग्रन्थों में पाणिनीय शिक्षा का विशेष रूप से उल्लेख है। वैदिक मन्त्रों के उच्चारण के लिये स्वर ज्ञान कि नितान्त आवश्यकता होती है। वेदों में तीन स्वर बताये गये हैं.. उदात्त , अनुदात्त, स्वरित जिन्हें पाणिनि नें.. उच्चैरुदात्तः, नीचैरुदात्तः, समाहरस्वरितः सूत्र से स्पष्ट किया है।

*.. यजुर्वेद.. याज्ञवलक्य शिक्षा, वाशिष्ठी शिक्षा, माण्डव्य शिक्षा , भारद्वाज शिक्षा, माध्यन्दिन शिक्षा आदि।

*.. सामवेद.. नारदीय शिक्षा, शाकटायन शिक्षा आदि।

*.. अथर्ववेद.. माण्डूकी शिक्षा, शौनकीय शिक्षा आदि।

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2..कल्प ..

वैदिक वाङ्गमय में वेदाङ्गो के अन्तर्गत कल्प सूत्रों का महत्वपूर्ण स्थान है। कल्प शास्त्र को वेद पुरुष का हाथ माना गया है…” हस्तौ कल्पोऽथपठ्यते “

कल्प का अर्थ है.. यज्ञ की विधियों का प्रतिपादन..ये यज्ञ की विधियों का समर्थन तथा उनका प्रतिपादन करने वाले शास्त्र हैं।”कल्प्यते समर्थ्यते यज्ञयागादि प्रयोगाः अत्र”।

ऋक्प्रातिशाख्य में कल्प के बारे में कहा गया है.. “कल्पो वेद विहितानां  कर्मणामनुपूर्व्येण कल्पना शास्त्रम् “…। अर्थात कल्प वेदों में प्रतिपादित कर्मों का भलीभांति विचार प्रस्तुत करने वाला शास्त्र है।

ये कल्प शास्त्र सूत्र शैली में  हैं , अतः इन्हें कल्पसूत्र कहा जाता है।इनमें यज्ञ के विधानों का , विवाह उपनयन आदि कर्मों का प्रतिपादन किया गया है।

इनमें वर्णित विषय के अनुसार कल्प सूत्र चार भागों में विभाजित हैं….

1..श्रौत सूत्र.. 2. गृह्य सूत्र..3.. धर्म सूत्र..4.. शुल्व सूत्र..

संक्षेप में इनका वर्णन इस प्रकार है..

**श्रौत सूत्र..

श्रुति अर्थात वेदों द्वारा प्रतिपादित महत्वपूर्ण यज्ञादि का क्रमबद्ध वर्णन जिस सूत्र में है, उसे श्रौत सूत्र नाम से अभिहित किया गया है। श्रुतेः इदं व्याख्यानं श्रौतं।

इनमें.. दशपौर्ण मास यज्ञ , पितृ पिण्ड, सोमयाग, वाजपेय,  राजसूय, अश्वमेध, पुरुष मेध, इत्यादि यज्ञों का क्रमबद्ध वर्णन है। दक्षिण , आहवनीय तथा गार्हपत्य आदि इष्टियों का वर्णन है।

चारो वेदों से संबन्धित अलग अलग श्रौत सूत्र हैं। कुछ प्रमुख श्रौत सूत्र इस प्रकार हैं..

*ऋग्वेद  के आश्वलायन तथा शांखायन श्रौत सूत्र हैं।

**शुक्ल यजुर्वेद.. कात्यायन श्रौत सूत्र।

**कृष्ण यजुर्वेद.. बौधायन , आपतस्तम्ब, हिरण्यकेशी या सत्याषाढ, बैखानस, भारद्वाज, मानव तथा वाराह श्रौत सूत्र हैं।

***सामवेद.. आर्षेय या मशक , द्राह्यायण, जैमिनीय श्रौत सूत्र।

****अथर्ववेद… वैतान श्रौत सूत्र।

**गृह्य सूत्र..

गृह्य सूत्रों में स्मार्त कर्म अर्थात गृहस्थ जीवन से संबन्धित सभी संस्कारों और उनकी विधियों का वर्णन है। इनमें  16 संस्कार, 5 महायज्ञ, 7 पाक यज्ञ, गृह निर्माण, गृह प्रवेश, पशु पालन, रोग नाशक आदि विधियों का वर्णन है।

प्रमुख गृह्य सूत्र.. 

ऋग्वेद..आश्वलायन तथा शांखायन तथा कौषीतक गृह्य सूत्र…

शुक्लयजुर्वेद.. पारस्कर गृह्य सूत्र

कृष्ण यजुर्वेद.. बौधायन , आपतस्तम्ब, हिरण्यकेशी, भरद्वाज , मानव  तथा काठक गृह्य सूत्र।

सामवेद.. द्राह्यायण.., गोभिल , खादिर.., जैमिनीय गृह्य सूत्र.

अथर्ववेद.. कौशिक गृह्य सूत्र..

**धर्म सूत्र..

धर्म सूत्रों में नीति , धर्म, रीति, प्रथाओं, चारो वर्णों  और आश्रमों के कर्तव्यों  और सामाजिक नियमों का  तथा प्रायश्चित आदि का वर्णन है।

प्रमुख धर्म सूत्र…

*ऋग्वेद.. वशिष्ठ धर्म सूत्र..

*शुक्ल यजुर्वेद.. हारीत और शंख धर्मसूत्र

*कृष्ण यजुर्वेद..बौधायन , आपतस्तम्ब, हिरण्यकेशी,धर्मसूत्र

*सामवेद.. गौतम धर्मसूत्र

**शुल्व सूत्र..

शुल्व अर्थात.. रस्सी या रज्जु। रज्जु की सहायता से नाप कर यज्ञ की वेदी का निर्माण करना। शुल्व सूत्रों में यज्ञवेदी के निर्माण से संबद्ध नाप आदि का तथा यज्ञ वेदी के निर्माण आदि के नियमों का वर्णन है।

भारत में रेखागणित/ज्यामिति के विकास की उत्कृष्ट जानकारी इनमें मिलती है।

विभिन्न कामनाओं के अनुसार अलग अलग यज्ञ होते हैं तथा उनके अनुसार ही अलग अलग आकृति की यज्ञ वेदी का विधान है जिसके आकार का माप निश्चित था , और नाप कर उतने ही माप से यज्ञ वेदी का निर्माण करना चाहिये।

शुल्व सूत्र केवल यजुर्वेद के ही मिलते हैं, क्योंकि ये यज्ञादि अनुष्ठान परक कर्मों से संबन्धित हैं।

शुक्ल यजुर्वेद..कात्यायन शुल्व सूत्र

कृष्ण यजुर्वेद..बौधायन , आपतस्तम्ब।

मैक्डोनल नें शुल्व सूत्रों का वैज्ञानिक महत्व स्वीकार करते हुए कहा है.. ” इन सूत्रों में रेखा गणित सम्बन्धी ज्ञान बहुत आगे बढ़ा हुआ पाया जाता है। वस्तुतः शुल्व सूत्र ही भारत के गणित शास्त्र के सबसे प्राचीन ग्रन्थ कहे जा सकते हैं।

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3..व्याकरण..

मुखं व्याकरणम् स्मृतं..

यह वेदाङ्ग पदों (शब्दों ) की प्रकृति तथा प्रत्यय के बारे में बता कर उनके स्वरूप का परिचय कराता है।

व्याकरण को वेद पुरुष का मुख माना गया है।”  मुखं व्याकरणम् स्मृतं “

जिस प्रकार मनुष्य के शरीर में मुख अभिव्यक्ति और विश्लेषण का साधन है , उसी प्रकार  व्याकरण भी वैदिक मन्त्रों ,वाक्य, वाक्य का सही अर्थ समझने, तथा शब्दों के प्रकृति प्रत्यय को समझने का तथा विश्लेषण करने का साधन है।

इसीलिये व्याकरण के बारे में कहा गया है..”व्याकृयन्ते विविच्यन्ते शब्दा: अनेनेति व्याकरणम् “।

महर्षि कात्यायन नें व्याकरण शास्त्र के पांच प्रयोजन बताये हैं..”रक्षोहागम लघ्वसंदेहाः प्रयोजनम् “।

1..रक्षा.. अर्थात वेदों की रक्षा..

2..ऊह.. यथा स्थान विभक्ति आदि का परिवर्तन

3.आगम.. निष्काम भाव से वेद आदि का अध्ययन

4.. लघु.. संक्षेप करना

5..असन्देह.. संदेह का निराकरण

व्याकरण का प्राचीन रूप,ब्राह्मण ग्रन्थों में निर्वचन आदि के रूप में मिलता है।गोपथ ब्राह्मण में धातु प्रतिपादिक आख्यात, लिङ्ग, विभक्ति वचन प्रत्यय स्वर आदि के विषय में प्रश्न पूछा गया है।

ब्राह्मण ग्रन्थों के बाद प्रातिशाख्य ग्रन्थ में व्याकरण का प्रारम्भिक और व्यवस्थित रूप है।

कुछ स्थानों पर व्याकरण के आठ संप्रदायों का नाम लिया गया है। महर्षि शाकटायन नें अपने ग्रन्थ ऋक्तन्त्र में लिखा है…

व्यकरण शास्त्र का कथन सर्व प्रथम ब्रह्मा ने बृहस्पति,… बृहस्पति नें इन्द्र से… इन्द्र नें भारद्वाज से… भारद्वाज नें ऋषियों से … ऋषियों नें ब्राह्मणों से किया। इस प्रकार ऐन्द्र व्याकरण सबसे प्रचीन व्याकरण के रूप में उपलब्ध होता है।

परन्तु व्याकरण का सबसे पूर्ण और व्यवस्थित रूप आचार्य पाणिनि द्वारा ही प्रस्तुत किया गया है। इनके द्वारा रचित ग्रन्थ अष्टाध्यायी है। इस ग्रन्थ में कुल आठ अध्याय हैं।

इस ग्रंथ को अष्टाध्यायी,अष्टक, शब्दानुशासन, तथा वृत्तिसूत्र आदि नामों से जाना जाता है।यह संस्कृत व्याकरण का प्रतिनिधित्व करने वाला एकमात्र मूल व्याकरण ग्रंथ है।

इस ग्रंथ में लगभग ४००० सूत्र और आठ अध्याय हैं।प्रत्येक अध्याय चार- चार पादों में विभक्त है।ये पाद, सूत्रों में हैं।

प्रथम व द्वितीय अध्याय में संज्ञा, परिभाषा व समास से संबंधित सूत्र हैं।तृतीय से पंचम अध्याय तक कृदंत व तद्धित प्रत्ययों का उल्लेख है।

षष्टम अध्याय में संधि, स्वर, द्वित्व, संप्रसारण , आगम तथा लोप व दीर्घ आदि के सूत्र हैं। अष्टम् अध्याय में द्वित्व, प्लुत, णत्व , षत्व आदि के नियम बताए गए हैं।

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4..निरुक्त..

निरुक्त को वेद पुरुष का श्रोत्र कहा गया है। प्राचीन समय में ज्ञान प्राप्ति श्रवण द्वारा होती थी। वेद श्रुत ज्ञान हैं , अतः वेदाध्ययन में श्रवण का विशेष महत्व है।

निरुक्त,  निघन्टु के ऊपर लिखी गई  टीका है। इसमें वैदिक पदों की निरुक्ति /निर्वचन अर्थात व्युत्पत्ति की पद्धति दी गई है।

संप्रति महर्षि यास्क द्वारा लिखा गया निरुक्त ही इस विषय का प्रामाणिक ग्रन्थ उपलब्ध है। यह ‘ निघन्टु ‘ नामक वैदिक शब्द कोश पर आधारित है तथा उसी की व्याख्या का ग्रन्थ है।

(नोट.. निघन्टु संस्कृत का प्राचीन शब्दकोश है। इसमें वैदिक साहित्य के शब्दों का सुव्यवस्थित संग्रह है। )

निरुक्त में वैदिक मन्त्रों की निर्वचनात्मक व्याख्या का प्रयास किया गया है। इस वेदार्थ पद्धति को नैरुक्त पद्धति कहा जाता है।

निघन्टु में पांच अध्याय हैं। प्रथम तीन अध्यायों में पर्यायवाची शब्द हैं , जैसे पृथ्वी के 21 पर्यायवाची शब्द हैं , मेघ के 30, वाणीवाचक 57 तथा जल के 100 पर्यायवाची शब्द हैं।

निघन्टु के पञ्चम अध्याय में देवता वाचक शब्द हैं। इनकी व्याख्या 7 से 12 अध्यायों में की गई है। इसे दैवत काण्ड कहते हैं। इसमें पृथ्वी , अन्तरिक्ष द्युलोक के देवताओं का विवेचन है। यास्क नें वैदिक देवता वाचक शब्द अग्नि, इन्द्र

निघन्टु का परिशिष्ट -1 भी 13वें अध्याय के नाम से उपलब्ध है। इसमें अक्षर, सोम, जातवेदस् आदि का वर्णन है। निरुक्त का प्रतिपाद्य विषय.. वर्णागम, वर्ण विपर्यय , वर्ण विकार, वर्ण नाश धातुओं का अनेक अर्थों में प्रयोग , है।

वार्णागमौ वर्णविपर्यश्च, द्वौ चापरौ वर्णविकारनाशौ।

धातोस्तदर्थातिशयेन योगस्तदुच्यते पञ्चविधं निरुक्तम्।।

यास्क रचित निरुक्तम्..।इस वेदाङ्ग का प्रतिनिधि ग्रन्थ है।निरुक्त 14 अध्यायों वाला ग्रन्थ है। निरुक्त का प्रथम 3 अध्यायों में पर्यायवाची शब्दों की व्याख्या है , अतः इन तीन अध्यायों को नैघन्टुक काण्ड कहते हैं।

चतुर्थ अध्याय में कठिन तथा अस्पष्ट वैदिक शब्द दिये गये हैं। इन शब्दों की व्याख्या तथा स्पष्टीकरण निरुक्त के 4से 6 अध्यायों में है। इसे नैगम काण्ड या ऐकपदिक कहते हैं।

शब्द व्युत्पत्ति, शब्द निर्वचन शास्त्र भाषा विज्ञान तथा अर्थ विज्ञान का यह सबसे प्राचीन व प्रामाणिक ग्रन्थ है। इसमें नाम आख्यात उपसर्ग और निपात आदि का लक्षण है।भाव विकार लक्षण, पद विभाग परिज्ञान, देवता परिज्ञान वर्ण विपर्यय का विवेचन, सम्प्रसार्य व असंप्रसार्य धातु , अभिशाप, अभिज्ञा, परिवेदना, निन्दा प्रशंसा आदि द्वारा मन्त्राभिव्यक्ति, उपदेश व देवताओं का वर्णन किया गया है।

वैदिक शब्द के निर्वचन के अतिरिक्त भाषा विज्ञान, साहित्य, समाजशास्त्र व ऐतिहासिक विषयों का भी समावेश किया गया है। यास्क नें वैदिक देवताओं को तीन वर्गों में रखा है..1.. पृथ्वी स्थानीय, 2. अन्तरिक्ष स्थानीय, 3.. द्युस्थानीय।

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5..छन्द...

छन्दः पादौ तु वेदस्य.. अर्थात छन्द वेदाङ्ग को वेद पुरुष के पादों के रूप में स्वीकार किया गया है। चूंकि वैदिक मन्त्र छन्दमय हैं। उनके सही प्रभाव के लिये , सही भाव संप्रेषण तथा सही उच्चारण के लिये छन्दस्.. छन्द का सही ज्ञान होना आवशयक है। इसके लिये छन्द विषयक व्रन्थों की रचना हुई।

वैदिक साहित्य में गद्य पद्य दोनों को छन्द युक्त माना गया है। कहा गया है कि छन्द के बिना वाणी का उच्चारण नहीं हो ही नहीं सकता।

महर्षि कात्यायन नें स्पष्टतः कहा है.. “जो व्यक्ति छन्द ऋषि तथा देवता के ज्ञान के बिना मन्त्र का अध्ययन – अध्यापन, यजन -याजन करते हैं , उनके सारे कार्य निष्फल होते हैं।”

यास्क नें छन्दस् का निर्वचन छद् धातु से किया है.. ” छंदांसि छादानात”.. अर्थात छन्द भावों को आच्छादित करके समष्टि रूप प्रदान करते हैं। वैदिक छन्दों की एक विशेषता है कि इसमें लौकिक संस्कृत की तरह लघु गुरु का कोई विशेष नियम नहीं है। ये अक्षर गणना पर नियत रहते हैं।

कात्यायन नें सर्वानुक्रमणी में छन्द का लक्षण बताया है… यदक्षरपरिमाणं तच्छन्दः… अर्थात संख्या विशेष में वर्णों की सत्ता छन्द है। प्रत्येक छन्द में वर्णों की सङ्ख्या निर्धारित रहती है।

छन्द वेदाङ्ग का एक मात्र प्रचलित ग्रन्थ आचर्य पिङ्गल कृत छन्द शास्त्र है। इस ग्रन्थ में छन्द का एक प्रमुख सूत्र यमाताराजभानसलगं है। सारा छन्द विचार इसी सूत्र में निहित है। यह ग्रन्थ सूत्र शैली में लिखा गया है। इसमें आठ अध्याय है। इस ग्रन्थ के प्रथम अध्याय से चौथे अध्याय के सातवें सूत्र तक वैदिक छन्दों के लक्षण दिये गये हैं, इसके पश्चात लौकिक छन्दों के लक्षण दिये गये हैं।

वैदिक छन्दों के दो प्रमुख भेद बताये गये हैं.. 1.अक्षर गणना के अनुसार तथा 2.पादाक्षर गणना अनुसार। वेदों में 21 छन्द पाये गये हैं । ये तीन सप्तकों में विभाजित किये गये हैं।

प्रथम सप्तक में..1. गायत्री..24 अक्षर , 2.. उष्णिक..28 अक्षर, 3.. अनुष्टुप..32 अक्षर, 4.. वृहती.36 अक्षर, 5.. पङ्क्ति..40 अक्षर, 6.. त्रिष्टुप..44 अक्षर, 7.. जगती..48 अक्षर..।

द्वितीय सप्तक के सातो छन्द अतिछन्द के नाम से जाने जाते हैं। ये हैं… 1..अतिजगती..52 अक्षर, 2.. शक्वरी 56 अक्षर, 3.. अति शक्वरी. 60 अक्षर 4.. अष्टि..64 अक्षर ,5.. अत्यष्टि..68 अक्षर.., 6.. धृति..72 अक्षर.., 7.. अतिधृति 76 अक्षर।

तृतीय सप्तक..1.. कृति..80 अक्षर, 2.. प्रकृति..84 अक्षर, 3.. आकृति..88 अक्षर, 4.. विकृति..92 अक्षर, 5.. संस्कृति..96 अक्षर., 6.. अभिकृति..100 अक्षर , 7.. उत्कृति..104 अक्षर..।

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6..ज्योतिष..

वेद ज्ञान और उसमें विहित यज्ञों के अनुष्ठान द्वारा इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट का निवारण के लिये शुभ मुहूर्त का होना भी नितान्त आवश्यक है। देश काल, पात्र का अनुकूल या प्रतिकूल होना भी अनुष्ठान की सफलता और असफलता का निर्धारण करता है।

वैदिक यज्ञों के शुभ मुहूर्त निर्धारण के लिये ज्योतिष वेदाङ्ग की आवश्यकता हुई। यह वेदाङ्ग यज्ञों का काल विधान बताता है। नक्षत्र , तिथि , वार , मास, संवत्सर आदि की जानकारी वेद विषयक कर्म काण्ड के लिये आवश्यक है। इस ज्ञान के लिये ज्योतिष का ज्ञान होना आवश्यक है। कहा गया है कि जो व्यक्ति ज्योतिष को भलीभांति जनता है , वही यज्ञ का भी यथार्थ ज्ञाता है।

ज्योतिष शास्त्र को वेद पुरुष का नेत्र कहा गया है.. ज्योतिषामयनं चक्षुः।

इस वेदाङ्ग का ” वेदाङ्ग ज्योतिष “ नामक ग्रन्थ उपलब्ध है। इसके रचयिता आचार्य लगध को माना जाता है। इस ग्रन्थ का दो वेदों… ऋग्वेद तथा यजुर्वेद से संबन्ध है।

ऋग्वेद से संबन्धित.. आर्च ज्योतिष है। इसमें 326 श्लोक हैं।

यजुर्वेद से संबन्धित.. याजुष् ज्योतिष है। इसमें 432 श्लोक हैं।

ये दो ग्रन्थ अत्यन्त गूढ़ और सारगर्भित हैं। ये आज भी विद्वानों के लिये रहस्य बने हुए हैं। इनकी व्याख्या करना आज भी कठिन कार्य है। बाल गङ्गाधर तिलक, सुधाकर द्विवेदी , डा. थीबो, शंकर बालकृष्ण दीक्षित आदि विद्वानों नें इन श्लोकों की समय समय पर व्याख्या की है।

बाल गङ्गाधर तिलक की “वेदाङ्ग ज्योतिष” टीका, शंकर बालकृष्ण दीक्षित जी की “भारतीय ज्योतिष” तथा सुधाकर द्विवेदी की “वेदाङ्ग ज्योतिष “टीका विशेष महत्वपूर्ण मानी जाती है।

ज्योतिष के सिद्धान्त ग्रन्थों में गणना 12 रशियों से की जाती है, परन्तु इस ज्योतिष में रशियों का कहीं भी नाम निर्देश नहीं है। 27 नक्षत्र ही गणना का आधार हैं।

वैदिक ज्योतिष में सूर्य चन्द्र ग्रह तथा नक्षत्रों की गति का निरीक्षण, परीक्षण तथा विवेचन होता था। सौर और चान्द्र मासों की गणना होती थी। यज्ञ सम्बन्धी कार्यों के लिये चान्द्रमास ही मुख्य माना जाता था।

इति षड् वेदाङ्ग परिचय..

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