ल्यप् प्रत्यय एक पूर्वकालिक कृदन्त प्रत्यय है।इस प्रत्यय का प्रयोग ‘ करके ‘(After doing)इस अर्थ में होता है।
जैसे.. सीतां आदाय रामः वनं अगच्छत्।
सीता को लेकर राम वन को गये।
इस प्रत्यय से बने शब्द, अव्यय बन जाते हैं।
ल्यप् प्रत्यय के रूप बनाने के नियम..निम्नलिखित हैं….
यदि धातु से पहले कोई उपसर्ग आये तो ल्यप् प्रत्यय का प्रयोग होता है।
ल्यप् प्रत्यय के लिये उपसर्ग का होना आवश्यक है।
धातु से पूर्व यदि उपसर्ग नही है तो ल्यप् का प्रयोग नही हो सकता।
ल्यप् प्रत्यय का केवल य ही शेष रह जाता है,ल् और प् का लोप हो जाता है।
यदि धातु के अन्त में आ,ई,ऊ में से कोई स्वर होता है तो ल्यप् का केवल’ य ‘ ही लगता है।
जैसे… उत् + स्था + ल्यप् ( ल्यप् का य )
उत् +स्था +य =उत्थाय ( उठकर)
आ +दा + ल्यप् (ल्यप् का य )
आ +दा +य = आदाय
यहां स्था के अन्त में आ स्वर है,इसलिये य् का प्रयोग हुआ है।
परन्तु यदि धातु के अन्त में कोई ह्रस्व स्वर (अ,इ,उ,ऋ )होता है,तो य के पहले त् लगता है।
वि +जि +ल्यप्
वि + जि +त् + ल्यप् ( ल्यप् का य )
=विजित्य ( विजय करके )
जि धातु के अन्त में इ…ह्रस्व स्वर है,इसलिये त् लगा है।
यदि धातु के अन्त में दीर्घ ऋ आती है,तो ऋ + ल्यप् = ईय् हो जाता है।
जैसे..वि + कृ +ल्यप् = विकीर्य
अव + तृ +ल्यप् = अवतीर्य
जिन धातुओं के अन्त में म या न होता है,उनके साथ ल्यप् प्रत्यय होने पर धातु के न या म् का लोप होता है।
यह लोप विकल्प से अर्थात कही होता है और कही नही होता है।
जैसे…
आ + गम् + ल्यप् = आगम्य (म् का लोप नही)
आ + गम् + ल्यप् = आगत्य (म् का लोप हो कर ) म का लोप हो कर य के पहले त् लगा है।
क्त्वा प्रत्यय के लिये इसे देखिये…
क्त प्रत्यय के लिये इसे देखिये
ल्यप् प्रत्यय के उदाहरण….
सम् आ | घ्रा + ल्यप् | समाघ्राय |
प्रति | ज्ञा + ल्यप् | प्रतिज्ञाय |
सम् | तृ + ल्यप् | संतीर्य |
प्र | भञ्ज् + ल्यप् | प्रभज्य |
अनु | वद् + ल्यप् | अनुद्य |
प्र | बुध्+ ल्यप् | प्रबुध्य |
सम् | पृच्छ् + ल्यप् | संपृच्छ्य |
नी | पा + ल्यप् | निपीय |
वि | लप् + ल्यप् | विलप्य |
नि | शम् +ल्यप् | निशम्य |
वि | लिख् +ल्यप् | विलिख्य |
उप् | लभ् +ल्यप् | उपलभ्य |
नि | पत् +ल्यप् | निपत्य |
प्र | आप् +ल्यप् | प्राप्य |
सम् | आप् +ल्यप् | समाप्य |
अनु | कृ +ल्यप् | अनुकृत्य |
वि | क्री +ल्यप् | विक्रीय |
नि | क्षिप् +ल्यप् | निक्षिप्य |
वि | गण् +ल्यप् | विगण्य |
आ | श्रि +ल्यप् | आश्रित्य |
प्र | विश् +ल्यप् | प्रविश्य |
सम् | हृ +ल्यप् | संहृत्य |
वि | हस् +ल्यप् | विहस्य |
वि | स्मृ +ल्यप् | विस्मृत्य |
नि | हृ +ल्यप् | निहृत्य |
उप् | स्पृश् +ल्यप् | उपस्पृश्य |
उप् | स्था +ल्यप् | उत्थाय |
वि | सृज् +ल्यप् | विसृज्य |
वि | ज्ञा +ल्यप् | विज्ञाय |
अधि | ई +ल्यप् | अधीत्य |
निर् | ईक्ष्य् +ल्यप् | निरीक्ष्य |
परि | ईक्ष्य् +ल्यप् | परीक्ष्य |
सम् | दृश् +ल्यप् | संदृश्य |
वि | धा +ल्यप् | विधाय |
प्र | नत् +ल्यप् | प्रणत्य |
प्र | नम् +ल्यप् | प्रणम्य |
आ | नी +ल्यप् | आनीय |
आ | गम् +ल्यप् | आगम्य |
आ | गम् +ल्यप् | आगत्य |
सम् | ग्रह् +ल्यप् | संगृह्य |
अनु | ग्रह् +ल्यप् | अनुगृह्य |
सम् | चित् +ल्यप् | संचित्य |
नि | सिञ्च् +ल्यप् | निषिन्च्य |
अव | रुद्ध् +ल्यप् | अवरुद्ध्य |
सम् | मथ् +ल्यप् | संमथ्य |
अव | मन् +ल्यप् | अवमत्य |
वि | भ्रम् +ल्यप् | विभ्रम्य् |
सम् | भू +ल्यप् | संभूय |
आ | रुह् +ल्यप् | आरुह्य |
सम् | दंश् +ल्यप् | संदश्य |
परि | त्यज् +ल्यप् | परित्यज्य |
वि | कृ +ल्यप् | विकृत्य |
वि | हा +ल्यप् | विहाय |
सम् | चित् +ल्यप् | संचित्य |
वि | छिद् +ल्यप् | विछिद्य |
ल्यप् से बने पदो का वाक्य में प्रयोग
- हस्तौ प्रक्षाल्य भोजनं कुर्यात।
- हाथों की धो कर भोजन करना चहिये
- मातापितरौ प्रणम्य पुत्रः विदेशं गच्छति।माता पिता को प्रणाम करके पुत्र विदेश जाता है।
- भक्तः शिवम् संपूज्य सुखं लभ्यते।
- भक्त शिव की पूजा करके सुख प्राप्त करता है।
- एवं विचार्य सः अवदत्।..
- ऐसा सोच कर वह बोला।
- सर्वं विज्ञाय देवः अवदत्।
- सब जान कर देव ने कहा।
- धनम् प्राप्य सेवकः प्रसीदति।
- धन प्राप्त करके सेवक प्रसन्न होता है।
- आलस्यं विहाय उद्यमम् कुरु।
- आलस्य को छोड़ कर परिश्रम करो।
- सः गृहे प्रविश्य अवदत्।
- उसने घर में प्रवेश करके कहा।
- आत्मा जीर्णं शरीरं विहाय नवीनं देहं संयाति।
- आत्मा पुराने शरीर को छोड़ कर नए शरीर में जाती है।
- सा अभिवाद्य अगच्छत्।
- वह अभिवादन करके गई।
- निपुणं निरीक्ष्य पठति।
- आसने उपविश्य पत्रम् लिख्।
- आसन पर बैठकर पत्र लिखो।
- रामायणं संपठ्य शान्तिं लभते।
- रामायण पढ़ कर शान्ति मिलती है।
- अथर्वः विद्यालयात् आगम्य भोजनं खादति।
- अथर्व विद्यालय से आकर भोजन करता है।
- त्वम् वृक्षं आरुह्य किम् करोषि?
- तुम वृक्ष पर चढ़ कर क्या कर रहे हो।
- छात्रः गुरुकुलम् प्रविश्य गुरुं प्रणमति।
- छात्र गुरुकुल में प्रवेश करके गुरु को प्रणाम करता है।
- सेवकः स्वामिनं प्रशस्य सुखं लभते।
- सेवक स्वामी की सेवा करके सुख प्राप्त करता है।
- अहम् कुपथं परित्यज्य सुपथं ग्रहीष्यामि।
- सुधा विहस्य मातरं वदति।
- सुधा हंस कर माता से बोली।
ल्यप् प्रत्यय के लिये इसे भी देखें..
शतृ प्रत्यय के लिये इसे देखिये
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